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आत्मा का वस्त्र

 

यह समझा जाता है कि मांस, हड्डी और खून से बने ढांचे का नाम ही ‘मनुष्य’ है। जबकि समस्त धार्मिक ग्रंथों की शिक्षाओं के प्रकाश में, यह स्पष्ट है कि मांस-मज्जा से बना हुआ यह शरीर वास्तविक मनुष्य नहीं है, बल्कि यह तो आत्मा का वस्त्र है। जब आत्मा इस वस्त्र से अपना संबंध तोड़ लेती है, तब शरीर की कोई हैसियत नहीं रह जाती। आप इसे जला दीजिए, टुकड़े-टुकड़े कर दीजिए या गड्ढे में दफना दीजिए, उसकी ओर से कोई प्रतिकार नहीं होगा।

आत्मा की सनातन विशेषता यह है कि वह हर लोक में अपने लिए एक वस्त्र धारण कर लेती है। जैसे इस जल-मिट्टी के संसार में उसने मांस और हड्डी का वस्त्र चुना, उसी प्रकार मृत्यु के बाद के जीवन यानी आलम-ए-आराफ़ (अज्ञात लोक) में भी वह अपने लिए एक नवीन वस्त्र गढ़ती है। उस वस्त्र में भी वही सभी विशेषताएँ और क्षमताएँ विद्यमान होती हैं, जो मृत्यु से पूर्व इस संसार में थीं। वहाँ लोग एक-दूसरे को पहचानते हैं और सुख-दुःख के भावों का भी अनुभव करते हैं। वे एक-दूसरे के बीच जन्नती (स्वर्गवासी) और दोजखी (नरकवासी) होने का भेद भी कर पाते हैं।

पवित्र कुरआन में सूरह आराफ़ में अल्लाह तआला फ़रमाते है:

 “और जन्नतवासी दोजखवासियों को पुकार कर कहेंगे: “हमने तो अपने पालनहार के वादे को सच्चा पाया, क्या तुमने भी अपने पालनहार के वादे को सत्य पाया?”

वे कहेंगे  “हाँ!”

तभी एक पुकारने वाला उनके बीच घोषणा करेगा: “अल्लाह की लानत हो उन ज़ालिमों पर, जो अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं, उसमें टेढ़ापन लाना चाहते हैं, और जो आख़िरत (परलोक) का इंकार करते हैं।“

उन दोनों दलों के बीच एक दीवार खड़ी होगी, और उन ऊँचाइयों (आराफ़) पर कुछ लोग होंगे, जो सभी को उनके चेहरों से पहचान लेंगे। वे जन्नतवासियों को पुकारकर कहेंगे: “तुम पर सलामती हो!” हालाँकि वे स्वयं जन्नत में प्रवेश नहीं कर सके होंगे, पर उसकी आशा रखते होंगे।

और जब उनकी दृष्टि दोजखवासियों की ओर घूमेगी, तो वे कह उठेंगे:

“हे हमारे पालनहार! हमें उन ज़ालिमों में शामिल न कर।“

फिर आराफ़ के लोग नरक के कुछ बड़े व्यक्तियों को उनकी पहचान से पुकारेंगे:

“क्या तुम वही नहीं हो, जिनके विषय में तुम शपथ खाकर कहते थे कि इन्हें तो अल्लाह अपनी रहमत में से कुछ भी नहीं देगा?”

(अब कहा जाएगा)

“जाओ, आज तुम जन्नत में प्रवेश करो, तुम्हें न कोई भय होगा और न कोई दुःख!”

अल्लाह के आदेश के अनुसार, मृत्यु के उपरांत मानव जाति और जिन्न जाति के लिए दो वर्ग निर्धारित हैं: एक “इल्लीऩ” (उच्च) और दूसरा “सिज्जीन” (निम्न)।

क़ुरआन पाक में “उच्च” और “निम्न” की व्याख्या इस प्रकार की गई है:

“और तुम क्या जानो कि सिज्जीन क्या है? यह एक लिखित अभिलेख है।“

(सूरह मुतफ़्फ़िफ़ीन, आयत 8-9)

“और तुम क्या जानो कि इल्लीऩ क्या है? यह भी एक लिखित अभिलेख है।“

(सूरह मुतफ़्फ़िफ़ीन, आयत 19-20)

“किताब-उल-मरक़ूम” का अर्थ है: अभिलेख (रिकॉर्ड)। मनुष्य पृथ्वी पर जो कुछ भी करता है, वह सब कुछ चलचित्र (फिल्म) के रूप में अंकित हो जाता है। यह बात भलीभांति स्मरण योग्य है कि हमारा प्रत्येक विचार, कल्पना, गति और कर्म, सभी का एक निश्चित आकार एवं रूप होता है। हम जो कुछ भी करते हैं, हमारे अपने चेतना-क्षेत्र में उसकी एक चलचित्र-रूप में अभिव्यक्ति हो जाती है। धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो चोरी की सज़ा हाथ काटने का विधान है। कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति चोरी करता है तो इस संपूर्ण घटना की एक फिल्म निर्मित होने लगती है। प्रथम, उस विचार की फिल्म बनेगी जिसमें चोरी की नीयत की जाती है। फिर, जब वह चोरी के लिए गमन करता है, उसकी भी फिल्मांकन होता है। फिर, चोरी करते समय के कृत्य और चोर के मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाओं का भी चलचित्र बनता है। जब वह चुराई गई वस्तु को अपने अधिकार में लेता है, तब भी उसका अभिलेख होता है।

हमारे धर्म में चोरी की दंड निश्चित है अर्थात् हाथ काटना तो इस दंड की भी एक फिल्मांकन प्रक्रिया होती है। इस प्रकार संपूर्ण घटना एक विस्तृत चलचित्र के रूप में अभिलेखित हो जाती है: ज़ैद ने चोरी के इरादे से घर से प्रस्थान किया, अमुक अमुक व्यक्ति के यहाँ चोरी की, पकड़ा गया, और चोरी की सज़ा स्वरूप उसका हाथ काट दिया गया। मनुष्य के प्रत्येक कर्म का इस प्रकार चलचित्र (फिल्म) के रूप में निरंतर अभिलेखन होता रहता है। मृत्यु के उपरांत ज़ैद इस चलचित्र को देखेगा या यों कहें कि एक विशिष्ट व्यवस्था के अंतर्गत उसे यह चलचित्र दिखाया जाएगा। इस अवस्था में ज़ैद दो प्रकार की मनःस्थितियों से गुजरता है।

पहली यह कि वह भूल जाता है कि वह केवल एक चलचित्र देख रहा है।

चलचित्र-दर्शन के दौरान जब वह दृश्य आता है जहाँ उसका हाथ काटा जाता है, तो वह वास्तविक रूप में उस वेदना (पीड़ा) को अनुभव करता है, ठीक उसी प्रकार जैसे हम कोई फिल्म देखते समय अपने भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते कभी अट्टहास करते हैं, कभी करुण दृश्य देखकर अश्रुपूरित हो उठते हैं, और कभी भयावह दृश्य देखकर भयभीत हो जाते हैं।

चलचित्र-दर्शन के पश्चात दूसरी अवस्था यह होती है कि व्यक्ति के ज़ेह्न में यह गहन बोध उत्पन्न होता है कि भविष्य में उसके साथ यह दंडात्मक घटनाएँ घटित होंगी।

साथ ही साथ, यह विचार भी आता है कि यदि हमने चोरी न की होती अथवा रिश्वत न ली होती तो भी हम सहज जीवन व्यतीत कर सकते थे।

वे लोग  (पश्चातवर्ती परिजन) जिनके लिए हमने यह पापकर्म किया, वे भी अब हमें किसी प्रकार का कोई लाभ नहीं पहुँचा सकते।

उसी प्रकार, पूँजीपति और धनलोलुप व्यक्ति के संकल्प, विचार और कर्मों का चलचित्र भी इसी ढंग से निर्मित होता है।

वह देखेगा कि मैं दूसरों के अधिकारों का हनन कर रहा हूँ।

मेरी कारणवश, लोग भूखे हैं, जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित और विपन्न हैं।

दरिद्रता के कारण उनका अस्तित्व स्वयं उनके लिए एक बोझ बन गया है — और इसका मूल कारण यह है कि संसाधनों पर मेरा एकाधिकार स्थापित है।

धनलोलुप व्यक्ति देखेगा कि मैं एक पूँजीपति हूँ, और जनता के ऊपर अत्याचार कर रहा हूँ।

मेरी वजह से लोग भूख और विपन्नता की चरम अवस्था में जीने को विवश हैं।

वास्तविकता यह है कि उनकी समस्त व्यथाओं और कष्टों का मैं ही उत्तरदायी हूँ।

न्याय का स्वाभाविक तकाज़ा यह है कि जैसे मैंने दूसरों के लिए दुःख और क्लेश का कारण बना, वैसे ही मुझे भी दंड स्वरूप वैसी ही पीड़ा सहनी चाहिए। जैसे ही यह बोध उदित होगा, वह स्वयं को चलचित्र में एक निर्धन, कंगाल, व्यथित, विकल और व्यग्र अवस्था में देखेगा। वह चीत्कार करेगा, विलाप करेगा, संतप्त अवस्था में इधर-उधर भटकेगा...किन्तु उसकी सुनवाई के लिए कोई उपस्थित न होगा।

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मोराकबा-Muraqba Hindi

ख्वाजा शम्सुद्दीन अजीमी


ग़ार-ए-हिरा के नाम

 

जहाँ अंतिम युग के संदेशता  (ﷺ) ने (रेहाना)किया और हज़रत जिब्राईल, क़ुरआन की प्रारंभिक आयतों को लेकर पृथ्वी पर अवतरित हुए।